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ग़ज़ल
सब क़द्रें पामाल हुईं इंसाँ ने ख़ुद को मस्ख़ किया
क़ुदरत ने कितनी मेहनत की थी अपनी बज़्म-आराई में
ज़फ़र हमीदी
ग़ज़ल
अपने आईने में ख़ुद अपनी ही सूरत हुई मस्ख़
मगर इस टूटे हुए दिल का मुदावा भी नहीं
सज्जाद बाक़र रिज़वी
नज़्म
ज़िंदगी मौत का आईना
अल्लाह की बनाई हुई चीज़ों को मस्ख़ करने की कोशिश की है
लेकिन इंसान मौत को गदला नहीं कर सका




