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ग़ज़ल
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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ग़ज़ल
पस-ए-दफ़्न भी न सुकूँ मिला तह-ए-ख़ाक हसरत-ए-इश्क़ को
कभी सब्ज़ा बन के लहक उठी कभी फूल बन के महक गई
वक़ार बिजनोरी
ग़ज़ल
लताफ़तों के नज़ाकतों के 'अजीब मज़मून हैं चमन में
सबा ने झटका है अपना दामन मसक गई है कली की चोली
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
तुम्हारी बख़िया-गरी मुसल्लम मगर कहाँ तक रफ़ू करोगे
मिरे गरेबाँ का हाल ये है जगह जगह से मसक रहा है
एहसान दरबंगावी
ग़ज़ल
लेख लिफ़ाफ़े से बाहर था सुर्ख़ी थी मज़मून ब-कफ़
मसक गईं मीठी मुस्कानें होंट खुले और गिरा नमक
राम प्रकाश राही
नज़्म
रक़ीब से!
तुझ से खेली हैं वो महबूब हवाएँ जिन में
उस के मल्बूस की अफ़्सुर्दा महक बाक़ी है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
शिकवा
क़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़
ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ताज-महल
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़
साहिर लुधियानवी
नज़्म
आवारा
ज़ख़्म सीने का महक उट्ठा है आख़िर क्या करूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ



