ज़र्बुल-मसल शायरी

उन के देखे से जो जाती है मुँह पर रौनक़

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

मिर्ज़ा ग़ालिब

ज़िंदगी ज़िंदा-दिली का है नाम

मुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैं

इमाम बख़्श नासिख़

मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बस

ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं

जौन एलिया

ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने

लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र था

वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'

कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है

मिर्ज़ा ग़ालिब

अब उदास फिरते हो सर्दियों की शामों में

इस तरह तो होता है इस तरह के कामों में

शोएब बिन अज़ीज़

उम्र तो सारी कटी इश्क़-ए-बुताँ में 'मोमिन'

आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे

Momin all your life in idol worship you did spend

How can you be a Muslim say now towards the end?

मोमिन ख़ाँ मोमिन

दामन पे कोई छींट ख़ंजर पे कोई दाग़

तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो

कलीम आजिज़

इक और दरिया का सामना था 'मुनीर' मुझ को

मैं एक दरिया के पार उतरा तो मैं ने देखा

मुनीर नियाज़ी

मैं समझा आप आए कहीं से

पसीना पोछिए अपनी जबीं से

अनवर देहलवी

शिकस्त फ़त्ह मियाँ इत्तिफ़ाक़ है लेकिन

मुक़ाबला तो दिल-ए-ना-तवाँ ने ख़ूब किया

नवाब मोहम्मद यार ख़ाँ अमीर

बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मिरे

जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे

साक़िब लखनवी

क़िस्मत तो देख टूटी है जा कर कहाँ कमंद

कुछ दूर अपने हाथ से जब बाम रह गया

क़ाएम चाँदपुरी

लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले

अपनी ख़ुशी आए अपनी ख़ुशी चले

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

गो क़यामत से पेशतर हुई

तुम आए तो क्या सहर हुई

मेला राम वफ़ा

मैं ने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'

मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है

मिर्ज़ा ग़ालिब

ये बज़्म-ए-मय है याँ कोताह-दस्ती में है महरूमी

जो बढ़ कर ख़ुद उठा ले हाथ में मीना उसी का है

शाद अज़ीमाबादी

इतनी बढ़ा पाकी-ए-दामाँ की हिकायत

दामन को ज़रा देख ज़रा बंद-ए-क़बा देख

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

चर्ख़ को कब ये सलीक़ा है सितमगारी में

कोई माशूक़ है इस पर्दा-ए-ज़ंगारी में

मन्नू लाल सफ़ा लखनवी