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साक़िब लखनवी

1869 - 1946 | लखनऊ, भारत

प्रमुख उत्तर कलासिकी शायर / अपने शेर ‘बड़े ग़ौर से सुन रहा था ज़माना...’ के लिए मशहूर

प्रमुख उत्तर कलासिकी शायर / अपने शेर ‘बड़े ग़ौर से सुन रहा था ज़माना...’ के लिए मशहूर

ग़ज़ल 46

शेर 17

कहने को मुश्त-ए-पर की असीरी तो थी मगर

ख़ामोश हो गया है चमन बोलता हुआ

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चल हम-दम ज़रा साज़-ए-तरब की छेड़ भी सुन लें

अगर दिल बैठ जाएगा तो उठ आएँगे महफ़िल से

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आप उठ रहे हैं क्यूँ मिरे आज़ार देख कर

दिल डूबते हैं हालत-ए-बीमार देख कर

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ई-पुस्तक 2

दीवान-ए-साकिब

 

1936

इंतिख़ाब-ए-ग़ज़लियात-ए-साक़िब

 

1983

 

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