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मज़ाक़ बदायुनी

1819 - 1894 | बदायूँ, भारत

ग़ज़ल 6

शेर 5

ज़बाँ पर आह रही लब से लब कभू मिला

तिरी तलब तो मिली क्या हुआ जो तू मिला

वाइज़ बुतों के आगे फ़ुरक़ाँ निकालिए

सूरत से उन की मअ'नी-ए-क़ुरआँ निकालिए

हम से वहशी नहीं होने के गिरफ़्तार कभी

लोग दीवाने हैं ज़ंजीर लिए फिरते हैं

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पुस्तकें 1

Aaina-e-Dildar

 

1956

 

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