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ग़ज़ल
मोहब्बत इर्तिबात-ए-क़ल्ब से मशरूत होती है
यक़ीन-ओ-रब्त के इबहाम हो जाने से डरता हूँ
अली मुज़म्मिल
ग़ज़ल
जुस्तुजू शर्त है मंज़िल नहीं मशरूत-ए-तलब
गुम हो इस तरह कि गर्द-ए-रह-ए-मंज़िल हो जाए
एहसान दानिश कांधलवी
ग़ज़ल
आना जाना साँस का क्या वस्ल से मशरूत है
तू चले तो थम रही है तू रुके तो चल रही है
सिदरा सहर इमरान
ग़ज़ल
किसी रुत से रहे मशरूत कब हैं रोज़-ओ-शब मेरे
जहाँ जैसा ये चाहे दिल वो मौसम ढूँड लेता है
शफ़ीक़ ख़लिश
नज़्म
पढ़ोगे लिखोगे
आग़ाज़ जिस का जनाब-ओ-हुज़ूर
इंतिहा ताबेदारी का इक ग़ैर मशरूत पैमान








