aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "mo.attal"
सग़ीर मलाल
1951 - 1992
शायर
गोपाल मित्तल
1901 - 1993
अश्वनी मित्तल 'ऐश'
born.1992
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
1815 - 1897
नवाब मोअज़्ज़म जाह शजीअ
अनवर मोअज़्ज़म
1929 - 2023
लेखक
समीना रहमत मनाल
born.1976
मोअज़्ज़म अली खां
born.1943
मोअज़्ज़म अज़्म
born.1961
नवाब अख़्तर महल अख़्तर
क़मर मलाल
नवाब सद्र महल सद्र
1840 - 1885
भगवान दास मोरवाल
प्रेम गोपाल मित्तल
born.1938
मोअज़्ज़म शिकवा ज़ाबिर
मेरे आ'साब मोअ'त्तल नहीं होने देंगेये परिंदे मुझे पागल नहीं होने देंगे
आईन-ए-ख़राबात मो'अत्तल है तो कुछ रोज़ऐ रिंद-ए-बला-नोश-ओ-तही-जाम तरस भी
ये बस्तियाँ हैं कि मक़्तल दुआ किए जाएँदुआ के दिन हैं मुसलसल दुआ किए जाएँ
ये कैसी बे-हिसी की धूल हम पर छा रही हैख़ुद अपनी ज़िंदगी से हम मोअ'त्तल हो रहे हैं
दहर भी 'मीर' तुर्फ़ा-ए-मक़्तल हैजो है सो कोई दम को फ़ैसल है
वहम एक ज़हनी कैफ़ियत है और ख़याल-ओ-फ़िक्र का एक रवैया है जिसे यक़ीन की मुतज़ाद कैफ़ियत के तौर पर देखा जाता है। इन्सान मुसलसल ज़िंदगी के किसी न किसी मरहले में यक़ीन-ओ-वहम के दर्मियान फंसा होता है। ख़याल-ओ-फ़िक्र के ये वो इलाक़े हैं जिनसे वास्ता तो हम सब का है लेकिन हम उन्हें लफ़्ज़ की कोई सूरत नहीं दे पाते। ये शायरी पढ़िए और उन लफ़्ज़ों में बारीक ओ नामालूम से एहसासात की जलवागरी देखिए।
ज़र्बुल-मसल शायरी
मानसिक स्वास्थ्य
मातलماتَل
मदहोश, मस्त
मो'तलمُعْتَل
कमज़ोर, निर्बल, बीमार
mortalmortal
फ़ानी
मु'अत्तलمُعَطَّل
जिससे काम न हो सके जैसे 'उज़्व-ए-मु'अत्तल, नाकारा अर्थात अकर्मन्य, ढीला, सुस्त, आलसी
Urdu Ke Zarb-ul-Masal Ashaar
मोहम्मद शम्सुल हक़
अशआर
Shahr-e-Malal
इरफ़ान सिद्दीक़ी
कुल्लियात
मक़्तल-ए-गुल
मोहम्मद अब्दुल्लाह क़ुरैशी
काव्य संग्रह
Khwaja Hasan Nizami Ki Inshaiya Nigari
नय्यर रिज़वी
अज़हर मसऊद
मक़्तल-ए-अबी मिख़्नफ़ व क़ियाम-ए-मुख़्तार
अबी मिख़्नफ़ लूत बिन यहया
इस्लामियात
Tazkira-e-Ulama-e-Farangi Mahal
मोहम्मद इनायतुल्लाह
तज़्किरा / संस्मरण / जीवनी
जज़्बात-ए-शजी
Ungliyon Par Ginti Ka Zamana
अफ़साना
Aafrinash
नॉवेल / उपन्यास
महल ख़ाना शाही
वाजिद अली शाह अख़्तर
इतिहास
Shan-e-Awadh : Begum Hazrat Mahal
वसीम अहमद सईद
क़ुर्रतुल-ऐन-हैदर
इर्तिज़ा करीम
फूलों की चादर
बेदम शाह वारसी
मसनवी
Ahwal Ulama-e-Farangi Mahal
शैख़ अल्ताफुर्रहमान
ये ज़ुल्म है ख़याल से ओझल न कर उसेजो हासिल-ए-सफ़र है मोअ'त्तल न कर उसे
आँख के शीश-महल से वो किसी भी लम्हेअपनी तस्वीर को ओझल नहीं होने देता
तेरी बाहों के हवसनाक तअस्सुर की क़समतू ने छोड़ा है मिरा जिस्म मो'अत्तल कर के
तग़य्युरात ने दस्तूर सब बदल डालेउसूल-ए-इश्क़ मोअ'त्तल नहीं हुआ अब तक
मिरी साँसों का जाने क्या बनेगातिरा आना मोअ'त्तल हो रहा है
इक सुर्ख़ लौ ने ऐसे मोअ'त्तल किए हवासएहसास ही ये हो नहीं पाया कि आग है
पसंद है हमें शोरिश फ़साद-ए-गिर्द-ओ-नवाहअगर हो शहर मोअ'त्तल तो नींद आती है
मो'अत्तल कर दिए आ'ज़ा से आ'ज़ा के रवाबितयहाँ जिस्मों को आँखों से जुदा रख्खा गया था
बिछड़ के उन से मिले तो कई सवाल हुएबहुत दिनों से मोअ'त्तल थे कब बहाल हुए
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