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गोपाल मित्तल

1901 - 1993 | दिल्ली, भारत

अपनी साहित्यिक पत्रिका 'तहरीक' के लिए विख्यात।

अपनी साहित्यिक पत्रिका 'तहरीक' के लिए विख्यात।

ग़ज़ल 23

नज़्म 11

शेर 9

मुझे ज़िंदगी की दुआ देने वाले

हँसी रही है तिरी सादगी पर

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फ़ितरत में आदमी की है मुबहम सा एक ख़ौफ़

उस ख़ौफ़ का किसी ने ख़ुदा नाम रख दिया

क्या कीजिए कशिश है कुछ ऐसी गुनाह में

मैं वर्ना यूँ फ़रेब में आता बहार के

लतीफ़े 3

 

पुस्तकें 368

1949 Ka Behtareen Adab

 

1949

उन्नीस सौ इक्कयावन के बेहतरीन अफ़्साने

 

 

Aazadi ka Adab

Part - 001

1954

Aazadi Ki Nayi Wusaten

 

 

अदब में तरक़्क़ी पसन्दी

एक अदबी तहरीक या साज़िश?

1958

Azadi ki Nai Wusaten

 

 

Babool Ke Ped

 

1966

बिस्मिल सईदी

शख़्स और शायर

 

Bismil Saeedi: Shakhs Aur Shair

 

1976

कैंसर वार्ड

 

1970

चित्र शायरी 1

दौर-ए-फ़लक के शिकवे गिले रोज़गार के हैं मश्ग़ले यही दिल-ए-ना-कर्दा-कार के यूँ दिल को छेड़ कर निगह-ए-नाज़ झुक गई छुप जाए कोई जैसे किसी को पुकार के सीने को अपने अपना गरेबाँ बना के हम क़ाएल नहीं हैं पैरहन-ए-तार-तार के क्या कीजिए कशिश है कुछ ऐसी गुनाह में मैं वर्ना यूँ फ़रेब में आता बहार के इक दिल और उस पे हसरत-ए-अरमाँ का ये हुजूम क्या क्या करम हैं मुझ पे मिरे कर्दगार के हम को तो रोज़-ए-हश्र का भी कुछ यक़ीं नहीं क्या मुंतज़िर हूँ वादा-ए-फ़र्दा-ए-यार के किस दिल से तेरा शिकवा-ए-बेदाद कर सकें मारे हुए हैं हम निगह-ए-शर्मसार के

 

ऑडियो 5

अपने अंजाम से डरता हूँ मैं

ज़बान रक़्स में है और झूमता हूँ मैं

तेरा ख़ुलूस-ए-दिल तो महल्ल-ए-नज़र नहीं

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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