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नज़्म
होली
दिल शाद किया और मोह लिया ये, जौबन पाया होली ने
कुछ तबले खटके ताल बजे कुछ ढोलक और मुर्दंग बजी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
आओ फिर से दिया जलाएँ
वर्तमान के मोह जाल में आने वाला कल न भुलाएँ
आओ फिर से दिया जलाएँ
अटल बिहारी वाजपेयी
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ग़ज़ल
बेकल उत्साही
ग़ज़ल
वो सपना सा है साया सा वो मुझ में मोह-माया सा
वो इक दिन छूट जाना है अभी हासिल सा लगता है
भवेश दिलशाद
ग़ज़ल
'हबीब' अपनी ग़ज़ल में भी हो वो सोज़-ओ-गुदाज़
जो दिल को मोह ले कान्हा की बाँसुरी की तरह














