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ज़हीर देहलवी

1825 - 1911 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 49

शेर 35

चाहत का जब मज़ा है कि वो भी हों बे-क़रार

दोनों तरफ़ हो आग बराबर लगी हुई

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शिरकत गुनाह में भी रहे कुछ सवाब की

तौबा के साथ तोड़िए बोतल शराब की

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ख़ैर से रहता है रौशन नाम-ए-नेक

हश्र तक जलता है नेकी का चराग़

पुस्तकें 6

Atthara Sau Sattawan Ke Chashmdeed Halaat

 

2006

Auraq-e-Karbala

 

1997

Dastan-e-Ghadar

 

1955

Dastan-e-Ghadar Ya Taraz-e-Zaheeri

 

 

दीवान-ए-ज़हीर

खण्ड-001

1899

इंतिख़ाब-ए-कलाम-ए-ज़हीर देहलवी

 

1989

 

ऑडियो 15

उन को हाल-ए-दिल-ए-पुर-सोज़ सुना कर उट्ठे

जहाँ में कौन कह सकता है तुम को बेवफ़ा तुम हो

जाते हो तुम जो रूठ के जाते हैं जी से हम

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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