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ग़ज़ल
जो हो हमदर्द ख़िल्क़त का वतन का जो मुरब्बी हो
ग़ज़ब है ज़ात पर उस की अज़िय्यत हो अज़िय्यत हो
श्याम सुंदर लाल बर्क़
नज़्म
मीरा-जी साहिब
''मीरा-जी को मानने वाले कम हैं लेकिन हम भी हैं
'फ़ैज़' की बात बड़ी है फिर भी अब वैसा कौन आएगा''
जमीलुद्दीन आली
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ग़ज़ल
हम पास से तुम को क्या देखें तुम जब भी मुक़ाबिल होते हो
बेताब निगाहों के आगे पर्दा सा ज़रूर आ जाता है
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर घर का रस्ता भूल गया
क्या है तेरा क्या है मेरा अपना पराया भूल गया
मीराजी
ग़ज़ल
अफ़्सुर्दगी ओ ज़ोफ़ की कुछ हद नहीं 'अकबर'
काफ़िर के मुक़ाबिल में भी दीं-दार नहीं हूँ
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
कोई ठहरा हो जो लोगों के मुक़ाबिल तो बताओ
वो कहाँ हैं कि जिन्हें नाज़ बहुत अपने तईं था
हबीब जालिब
ग़ज़ल
वाइ'ज़ कमाल-ए-तर्क से मिलती है याँ मुराद
दुनिया जो छोड़ दी है तो उक़्बा भी छोड़ दे
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
मगर दोज़ख़ पिघल जाए जो मेरे साँस अपना ले
तुम अपनी माम के बेहद मुरादी मिन्नतों वाले









