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नज़्म
व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)
उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
इश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिरा
आसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़ून फिर ख़ून है
कहीं शोला कहीं नारा कहीं पत्थर बन कर
ख़ून चलता है तो रुकता नहीं संगीनों से
साहिर लुधियानवी
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नज़्म
ऐ मेरे सारे लोगो
नारा-ए-हुब्ब-ए-वतन माल-ए-तिजारत की तरह
जिंस-ए-अर्ज़ां की तरह दीन-ए-ख़ुदा की बातें
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
काली रात के सहराओं में नूर-सिपारा लिक्खा था
जिस ने शहर की दीवारों पर पहला ना'रा लिक्खा था
अहमद सलमान
ग़ज़ल
ब-ज़ाहिर सादगी से मुस्कुरा कर देखने वालो
कोई कम-बख़्त ना-वाक़िफ़ अगर दीवाना हो जाए
हफ़ीज़ जालंधरी
हास्य
याँ न वो ना'रा-ए-तकबीर न वो जोश-ए-सिपाह
सब के सब आप ही पढ़ते रहें सुब्हान-अल्लाह
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
अपनी मल्का-ए-सुख़न से
चारों तरफ़ से नारा-ए-सल्ले-अला उठे
तेरे मुजस्समों से ज़मीं जगमगा उठे
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
राहिल हूँ मुसलमान ब-साद-नारा-ए-तकबीर
ये क़ाफ़िला ये बाँग-ए-दरा मेरे लिए है
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
ग़ज़ल
नया मस्लक नया रंग-ए-सुख़न ईजाद करते हैं
उरूस-ए-शेर को हम क़ैद से आज़ाद करते हैं


