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नज़्म
रिश्वत
ख़ूब हक़ के आस्ताँ पर और झुके अपनी जबीं
जाइए रहने भी दीजे नासेह-ए-गर्दूँ-नशीं
जोश मलीहाबादी
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ग़ज़ल
थीं बनात-उन-नाश-ए-गर्दुं दिन को पर्दे में निहाँ
शब को उन के जी में क्या आई कि उर्यां हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
क़दम यूँ बे-ख़तर हो कर न मय-ख़ाने में रख देना
बहुत मुश्किल है जान ओ दिल को नज़राने में रख देना
वासिफ़ देहलवी
ग़ज़ल
गुज़र इस हुज्रा-ए-गर्दूं से हो कीधर अपना
क़ैद-ख़ाना है 'अजब गुम्बद-ए-बे-दर अपना
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
जाम गर्दिश में है दर-बंद हैं मय-ख़ानों के
कुछ फ़रिश्ते हैं यहाँ रूप में इंसानों के
शकील बदायूनी
कुल्लियात
दौर-ए-गर्दूं से हुई कुछ और मयख़ाने की तरह
भर न आवें क्यूँके आँखें मेरी पैमाने की तरह
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
कौन ये नासेह को समझाए ब-तर्ज़-ए-दिल-नशीं
इश्क़ सादिक़ हो तो ग़म भी बे-मज़ा होता नहीं