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नज़्म
ताज-महल
सीना-ए-दहर के नासूर हैं कोहना नासूर
जज़्ब है उन में तिरे और मिरे अज्दाद का ख़ूँ
साहिर लुधियानवी
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ग़ज़ल
जहाँ ख़ाली नहीं रहता कभी ईज़ा-दहिंदों से
हुआ नासूर-ए-नौ पैदा अगर ज़ख़्म-ए-कुहन बिगड़ा
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
बख़्त-ए-वाज़ूँ से जले क्यूँ दिल न मुझ महरूर का
मर्हम-ए-काफ़ूर से मुँह आ गया नासूर का
अमीर मीनाई
नज़्म
ज़िंदगी
क़ल्ब-ए-आदम के ये रिसते हुए कोहना नासूर
अपने एहसास से है फ़ितरत-ए-इंसाँ मजबूर
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
अरक़ जब उस परी के चेहरा-ए-पुर-नूर से टपके
ख़जिल हो गुल से शबनम जूँ लहू नासूर से टपके
आरिफ़ुद्दीन आजिज़
ग़ज़ल
वफ़ा करने से वो मजबूर हो जाए तो क्या कीजे
मोहब्बत रूह का नासूर हो जाए तो क्या कीजे
अमीता परसुराम मीता
ग़ज़ल
नहीं ये मरहला ऐ दोस्त हर बिस्मिल की क़िस्मत में
बहुत मुश्किल से कोई ज़ख़्म-ए-दिल नासूर होता है
आमिर उस्मानी
ग़ज़ल
तअ'ल्लुक़ टूटने का ग़म कभी हम से भी पूछो तुम
तुम्हारा ज़ख़्म ही नासूर हो ऐसा नहीं होता
अम्बर खरबंदा
ग़ज़ल
नहीं रुकते घड़ी-भर तालिब-ए-दीदार के आँसू
ये ज़ालिम शौक़ गोया आँख का नासूर होता है














