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नज़्म
शीशों का मसीहा कोई नहीं
इन दोनों में रन पड़ता है
नित बस्ती-बस्ती नगर-नगर
हर बस्ते घर के सीने में
हर चलती राह के माथे पर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
उस के कूचे में है नित सूरत-ए-बेदाद नई
क़त्ल हर ख़स्ता बा-अंदाज़-ए-दिगर होता है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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ग़ज़ल
हर क़दम पर नित-नए साँचे में ढल जाते हैं लोग
देखते ही देखते कितने बदल जाते हैं लोग
हिमायत अली शाएर
शेर
सभी इनआम नित पाते हैं ऐ शीरीं-दहन तुझ से
कभू तू एक बोसे से हमारा मुँह भी मीठा कर
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
नित नित का ये आना जाना मेरे बस की बात नहीं
दरबानों के नाज़ उठाना मेरे बस की बात नहीं
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
क़ितआ
नित-नए शहर नित-नई दुनिया
हम को आवारगी से प्यार रहा
उन के आने के ब'अद भी जालिब
देर तक उन का इंतिज़ार रहा





