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नज़्म
नाला-ए-फ़िराक़
आँख को मानूस है तेरे दर-ओ-दीवार से
अज्नबिय्यत है मगर पैदा मिरी रफ़्तार से
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मिल भी सकता है हमें मंज़िल-ए-हस्ती का सुराग़
वक़्त ने पाँव में ज़ंजीर न पहनाई हो








