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ग़ज़ल
एवज़ अपने गरेबाँ के किसी की ज़ुल्फ़ हात आती
हमारे हात के पंजे मगर शाने हुए होते
सिराज औरंगाबादी
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नज़्म
अफ़्रीक़ा कम-बैक
अफ़रीक़ी ख़िदमत पसंदों का नारा
पंजे में हथकड़ी की कड़ी बिन गई है गुर्ज़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
शाम के साए ज़िंदाँ की दीवारें ऊँची गिरने लगे
फूल सा दिल लोहे के पंजे में फिर आया रात हुई
बशीर बद्र
ग़ज़ल
वो राह-ए-ज़िंदगी में मुस्कुराना भूल जाता है
ग़रीबी जिस को अपनी ज़ुल्फ़ के पंजे में कसती है
क़मर अंजुम
नज़्म
नीली जिल्द की किताब
क़िस्मत वाले ठहरे उन के लाल गुलाबी पंजे
उर्दू का इक शायर आया उन के पाँव के नीचे
क़ैसर-उल जाफ़री
नज़्म
इस्म-ए-आज़म
जिस के पंजे से कोई ख़ुश-नसीब ही छुटता है
मुझे बरसों पहले गाँव में अपनी चितकबरी बकरी याद आ गई
मोहम्मद हनीफ़ रामे
ग़ज़ल
जहाँ के ज़ुल्म सहते सहते फ़ाख़्ता भी बारहा
अक़ब से पंजे मारती है फिर उक़ाब की तरह












