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नज़्म
अख़बार
सारा दिन मैं ख़ून में लत-पत रहता हूँ
सारे दिन में सूख सूख के काला पड़ जाता है ख़ून
गुलज़ार
ग़ज़ल
छीना था दिल को चश्म ने लेकिन मैं क्या करूँ
ऊपर ही ऊपर उस सफ़-ए-मिज़्गाँ में पट गया
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
तितलियों के पर किताबों में कहीं गुम हो गए
मुट्ठियों के आइने में एक चेहरा रह गया
अख़्तर होशियारपुरी
नज़्म
ब्लैक-आउट
एक पल ठहरो कि उस पार किसी दुनिया से
बर्क़ आए मिरी जानिब यद-ए-बैज़ा ले कर









