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नज़्म
जाने क्यूँ ऐसा हूँ मैं
लाल पतंग और पीली मैना इन्द्र-धनुष और नदी की धार
आते हैं जब ख़्वाब में मेरे दीवाना हो जाता हूँ
अबु बक्र अब्बाद
उद्धरण
जिस आसमान पर कबूतर, शफ़क़, पतंग और सितारे न हों ऐसे आसमान की तरफ़ नज़र उठा कर देखने को जी नहीं चाहता।...
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
नज़्म
मेरा कमरे से बस नींदों का रिश्ता था
जहाँ पर एक चिड़िया की सुरीली चहचहाहट थी
पतंगों की सजावट थी
चराग़ शर्मा
ग़ज़ल
मैं हूँ पतंग-ए-काग़ज़ी डोर है उस के हाथ में
चाहा इधर घटा दिया चाहा उधर बढ़ा दिया
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ऊट-पटाँग
कानों की इक नगरी देखी जिस में सारे काने देखे
एक तरफ़ से अहमक़ सारे एक तरफ़ से सियाने थे
गुलज़ार
ग़ज़ल
ये जो लाल रंग पतंग का सर-ए-आसमाँ है उड़ा हुआ
ये चराग़ दस्त-ए-हिना का है जो हवा में उस ने जला दिया
