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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
कभी जो आवारा-ए-जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसेंगे
बरहना-पाई वही रहेगी मगर नया ख़ार-ज़ार होगा
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
कहाँ मेरे दिल की हसरत, कहाँ मेरी ना-रसाई
कहाँ तेरे गेसुओं का, तिरे दोश पर बिखरना
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
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phir
फिर پِھر
जैसा एक बार हो चुका हो, वैसा ही दूसरी बार भी। एक बार और। दोबारा। पुनः। जैसे-(क) इस बार तो छोड़ देता हूँ, फिर कभी ऐसा काम मत करना। (ख) उनके मकान के बाद फिर एक बगीचा पड़ता है। पद-फिर फिर एक से अधिक बार। बार बार।
phir ke
फिर के پِھر کے
again
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ग़ज़ल
मिरी ज़ीस्त पर मसर्रत कभी थी न है न होगी
कोई बेहतरी की सूरत कभी थी न है न होगी
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
दीन से दूर, न मज़हब से अलग बैठा हूँ
तेरी दहलीज़ पे हूँ, सब से अलग बैठा हूँ
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
मैं तो जब जानूँ कि भर दे साग़र-ए-हर-ख़ास-ओ-आम
यूँ तो जो आया वही पीर-ए-मुग़ाँ बनता गया
मजरूह सुल्तानपुरी
नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
मर्द-ए-ख़ुदा का अमल इश्क़ से साहब फ़रोग़
इश्क़ है अस्ल-ए-हयात मौत है उस पर हराम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
जिस की पीरी में है मानिंद-ए-सहर रंग-ए-शबाब
कह रहा है मुझ से ऐ जूया-ए-असरार-ए-अज़ल
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मौलाना
हक़ीक़त क्या है ये तो आप जानें या ख़ुदा जाने
सुना है जिम्मी-कार्टर आप का है पीर मौलाना
हबीब जालिब
ग़ज़ल
बिसात-ए-बज़्म उलट कर कहाँ गया साक़ी
फ़ज़ा ख़मोश सुबू चुप उदास पैमाने
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
आसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैं
अंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैं




