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शेर
सुर्ख़-रू होता है इंसाँ ठोकरें खाने के बा'द
रंग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बा'द
सय्यद ग़ुलाम मोहम्मद मस्त कलकत्तवी
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नज़्म
वो कैसी औरतें थीं
जो सिल पर सुर्ख़ मिर्चें पीस कर सालन पकाती थीं
सहर से शाम तक मसरूफ़ लेकिन मुस्कुराती थीं
असना बद्र
नज़्म
रात और रेल
ज़द में कोई चीज़ आ जाए तो उस को पीस कर
इर्तिक़ा-ए-ज़िंदगी के राज़ बतलाती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
क्या हिना ख़ूँ-रेज़ निकली हाए पिस जाने के बाद
बन गई तलवार उन के हाथ में आने के बाद
जलील मानिकपूरी
नज़्म
बचपन का वो ज़माना
मेहंदी के पत्ते लाना और पीस कर लगाना
फिर सुर्ख़ हाथ अपने हर एक को दिखाना
अब्दुल क़ादिर
शेर
ऐ हिना रंग-ए-मोहब्बत तो है मुझ में भी निहाँ
तेरे धोके में कोई पीस न डाले मुझ को




