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नज़्म
रक़ीब से!
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
अश्क क़ाबू में नहीं राज़ छुपाऊँ क्यूँकर
दुश्मनी मुझ से मिरे दीदा-ए-तर रखते हैं
लाला माधव राम जौहर
ग़ज़ल
दिल-लगी तर्क-ए-मोहब्बत नहीं तक़्सीर मुआफ़
होते होते मिरे क़ाबू में तबीअ'त होगी
लाला माधव राम जौहर
ग़ज़ल
क़ब्र पर किस शान से वो बे-नक़ाब आने को है
आफ़्ताब-ए-सुब्ह-ए-महशर हम-रिकाब आने को है
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
नहीं गर तुझ पे क़ाबू दिल ही पर कुछ ज़ोर हो अपना
करूँ क्या ये भी तो ना-ताक़ती से हो नहीं सकता
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
इक नज़र नज़अ में देखी थी किसी की सूरत
मुद्दतों क़ब्र में बेचैन दिल-ए-ज़ार रहा
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
नज़्म
याद
गिला इस का नहीं क्यूँ तुम ने मुझ से अपना मुँह मोड़ा
नहीं क़ाबू था अपने दिल पे पैमान-ए-वफ़ा तोड़ा
शौकत परदेसी
ग़ज़ल
सुब्ह तक हिज्र में क्या जानिए क्या होता है
शाम ही से मिरे क़ाबू में नहीं दिल मेरा

