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विषय
क़फ़स
क़फ़स शायरी
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ग़ज़ल
मुर्ग़ान-ए-क़फ़स को फूलों ने ऐ 'शाद' ये कहला भेजा है
आ जाओ जो तुम को आना हो ऐसे में अभी शादाब हैं हम
शाद अज़ीमाबादी
नज़्म
परिंदे की फ़रियाद
आती नहीं सदाएँ उस की मिरे क़फ़स में
होती मिरी रिहाई ऐ काश मेरे बस में
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
क़फ़स में मुझ से रूदाद-ए-चमन कहते न डर हमदम
गिरी है जिस पे कल बिजली वो मेरा आशियाँ क्यूँ हो
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
हम को फँसना था क़फ़स में क्या गिला सय्याद का
बस तरसते ही रहे हैं आब और दाने को हम
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
इस सराब-ए-रंग-ओ-बू को गुलिस्ताँ समझा है तू
आह ऐ नादाँ क़फ़स को आशियाँ समझा है तू
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तस्वीर-ए-दर्द
बयाबान-ए-मोहब्बत दश्त-ए-ग़ुर्बत भी वतन भी है
ये वीराना क़फ़स भी आशियाना भी चमन भी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
झाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँ
सब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँ
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
हम ने जो तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ की है क़फ़स में ईजाद
'फ़ैज़' गुलशन में वही तर्ज़-ए-बयाँ ठहरी है








