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हिंदी ग़ज़ल
सर के ऊपर हाथ माँ का बोल के रखवा लिया
ख़ुद-ब-ख़ुद रब दी मेहर अपने पे बरसा ली मैं ने
शुभ चिंतन
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
हमेशा देर कर देता हूँ
किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
ख़ूब-सूरत मोड़
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों
न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिल-नवाज़ी की
साहिर लुधियानवी
नज़्म
रक़ीब से!
आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिस ने इस दिल को परी-ख़ाना बना रक्खा था
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मुझ से पहले
मुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने
शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो
अहमद फ़राज़
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है








