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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
पलक तक उस ने मरने के लिए जीने न दी मुझ को
''मैं तेरे इश्क़ में रंजीदा हूँ हाँ अब भी कुछ कुछ हूँ
जौन एलिया
ग़ज़ल
सितम पे ख़ुश कभी लुत्फ़-ओ-करम से रंजीदा
सिखाईं तुम ने हमें कज-अदाइयाँ क्या क्या
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नअत
वही 'इक़बाल' जिस को नाज़ था कल ख़ुश-मिज़ाजी पर
फ़िराक़-ए-तैबा में रहता है अब रंजीदा रंजीदा
इक़बाल अज़ीम
ग़ज़ल
शाद ओ ख़ुर्रम एक आलम को किया उस ने 'ज़फ़र'
पर सबब क्या है कि है रंजीदा ओ नाशाद तू
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
सुन जानाँ हम तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ और किसी दिन कर लेंगे
आज तुझे भी उजलत सी है हम भी कुछ रंजीदा हैं
इरफ़ान सत्तार
नज़्म
उन्हें मुझ से शिकायत है
रंजीदा पशेमाँ ज़ख़्म-ख़ूरदा-साअतों बीते दिनों को प्यार से छू कर
दिलासा दूँ थपक कर लोरियाँ दूँ
अज़रा नक़वी
ग़ज़ल
किस किस मंज़र पर ख़ुद को रंजीदा कर लूँ सोचूँगा
हर मंज़र पर आँखें मेरी नौहा करती रहती हैं
ज़फर इमाम
नज़्म
इंतिज़ार
ये होंटों में दिमाग़ों का खिंचाओ जागता क्यूँ है
ये चेहरे की लकीरें क्यूँ मुझे रंजीदा करती हैं











