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ग़ज़ल
ज़िंदगी में बे-अदब होने न दे तू रो'ब-ए-हुस्न
ख़ाक है मेरी पस-अज़-मर्ग और दामन यार का
हैदर अली आतिश
शेर
शब-ए-फ़िराक़ का छाया हुआ है रोब ऐसा
बुला बुला के थके हम क़ज़ा नहीं आई
सययद मोहम्म्द अब्दुल ग़फ़ूर शहबाज़
शेर
मिरे रोब में तो वो आ गया मिरे सामने तो वो झुक गया
मुझे लात खा के हुई ख़बर मुझे पीटता कोई और है
ज़ियाउल हक़ क़ासमी
ग़ज़ल
नज़र चेहरे पे डाली है मगर कुछ सहमी सहमी सी
हसीनों का ये रो'ब-ए-हुस्न उन का पासबाँ क्यों हो
जयकृष्ण चौधरी हबीब
ग़ज़ल
सिर्फ़ परवाना अदब से दम-ब-ख़ुद रहता नहीं
तेरे रो'ब-ए-हुस्न से महफ़िल में थर्राती है शम'
इम्दाद इमाम असर
ग़ज़ल
हो रहा है ये अयाँ ख़ौफ़-ज़दा चेहरे से
रो'ब ग़ालिब तो मिरा आज भी तुम पर है मियाँ
अलीमुद्दीन अलीम
ग़ज़ल
शब-ए-फ़िराक़ का छाया हुआ है रोब ऐसा
बुला बुला के थके हम क़ज़ा नहीं आई
सययद मोहम्म्द अब्दुल ग़फ़ूर शहबाज़
ग़ज़ल
हर रो'ब-ए-हुस्न दाब-ए-मोहब्बत मिज़ाज-ए-‘इश्क़
रखता है सर-बसर कोई ख़ूबी कमाल की





