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नज़्म
इबलीस की मजलिस-ए-शूरा
कौन बहर-ए-रुम की मौजों से है लिपटा हुआ
गाह बालद-चूँ-सनोबर गाह नालद-चूँ-रुबाब
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़्वाब जो बिखर गए
कटी हुई हैं उँगलियाँ रुबाब ढूँढता हूँ मैं
जिन्हें सहर निगल गई वो ख़्वाब ढूँढता हूँ मैं
आमिर उस्मानी
नज़्म
नौ-जवान से
सदा-ए-तीशा-ए-मज़दूर है तिरा नग़्मा
तू संग-ओ-ख़िश्त से चंग-ओ-रुबाब पैदा कर
असरार-उल-हक़ मजाज़
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रुबाई
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नज़्म
इंक़लाब
अब्र के पर्दों में साज़-ए-जंग की आवाज़ है
फेंक दे ऐ दोस्त अब भी फेंक दे अपना रुबाब
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
अहमद हुसैन माइल
ग़ज़ल
नग़मा-ए-नौ के वास्ते ग़ैर की एहतियाज क्या
छेड़ दे तार-ए-साज़-ए-दिल चंग-ओ-रुबाब कुछ नहीं
अम्न लख़नवी
ग़ज़ल
फ़र्दंग-ओ-चंग-ओ-नय दफ़ बीन-ओ-रुबाब-ओ-सुरनी
हम-साज़-ओ-हम-नवा हैं लेते हैं तान आठों





