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ग़ज़ल
तहज़ीब हाफ़ी
ग़ज़ल
वो जो बे-रुख़ी कभी थी वही बे-रुख़ी है अब तक
मिरे हाल पर इनायत कभी थी न है न होगी
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
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ग़ज़ल
तुम्हारी बे-रुख़ी ने लाज रख ली बादा-ख़ाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
आते आते यूँही दम भर को रुकी होगी बहार
जाते जाते यूँही पल भर को ख़िज़ाँ ठहरी है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जाएगा
रूखी-सूखी जो मिल जाए शुक्र करो तो बेहतर है
नासिर काज़मी
नज़्म
एक मुलाक़ात
तू मुस्कुराई मगर मुस्कुरा के रुक सी गई
कि मुस्कुराने से ग़म की ख़बर मिले न मिले












