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ग़ज़ल
है मिरा दश्त-ए-जुनूँ सात आसमानों से दो-चंद
रुब-ए-मस्कूँ वादी-ए-वहशत की चौथाई नहीं
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
तिरी उल्फ़त में जितनी मेरी ज़िल्लत बढ़ती जाती है
क़सम है रब्ब-ए-इज़्ज़त की कि इज़्ज़त बढ़ती जाती है
वासिफ़ देहलवी
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ग़ज़ल
मोमिन ख़ाँ मोमिन
नज़्म
रक़ीब से!
ज़ेर-दस्तों के मसाइब को समझना सीखा
सर्द आहों के रुख़-ए-ज़र्द के मअ'नी सीखे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
शिकवा
आ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़
क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रूई की तरह उड़ जाएँगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
क़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहीं
कुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहीं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
दश्ना-ए-ग़म्ज़ा जाँ-सिताँ नावक-ए-नाज़ बे-पनाह
तेरा ही अक्स-ए-रुख़ सही सामने तेरे आए क्यूँ









