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नज़्म
इतना मालूम है!
कभी सन्नाटों से वहशत जो हुई होगी उसे
उस ने बे-साख़्ता फिर मुझ को पुकारा होगा
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
बे-साख़्ता निगाहें जो आपस में मिल गईं
क्या मुँह पर उस ने रख लिए आँखें चुरा के हाथ
निज़ाम रामपुरी
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नज़्म
जुगनू
मैं जुगनू बन के तो तुझ तक पहुँच नहीं सकता
जो तुझ से हो सके ऐ माँ तू वो तरीक़ा बता
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
तो बेहतर है यही
तेरा बर्फ़ीला बदन बे-साख़्ता लौ दे उठा
मेरी साँसें शाम की भीगी हवाएँ हो गईं
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
मैं ने तो यूँही ज़िक्र-ए-वफ़ा छेड़ दिया था
बे-साख़्ता क्यूँ अश्क तुम्हारे निकल आए
मंसूर उस्मानी
नज़्म
मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब
ऐ इश्क़-ए-अज़ल-गीर ओ अबद-ताब
कुछ ख़्वाब कि मदफ़ून हैं अज्दाद के ख़ुद-साख़्ता अस्मार के नीचे
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
मिरी बे-साख़्ता हिचकी मुझे खुल कर बताती है
तिरे अपनों को गाओं में तो अक्सर याद आता है





