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नज़्म
इतना मालूम है!
उस ने बे-साख़्ता फिर मुझ को पुकारा होगा
चलते चलते कोई मानूस सी आहट पा कर
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
बे-साख़्ता निगाहें जो आपस में मिल गईं
क्या मुँह पर उस ने रख लिए आँखें चुरा के हाथ
निज़ाम रामपुरी
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नज़्म
जुगनू
अँधेरी रात के परछावें डसने लगते हैं
मैं जुगनू बन के तो तुझ तक पहुँच नहीं सकता
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
तो बेहतर है यही
तेरा बर्फ़ीला बदन बे-साख़्ता लौ दे उठा
मेरी साँसें शाम की भीगी हवाएँ हो गईं
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
मैं ने तो यूँही ज़िक्र-ए-वफ़ा छेड़ दिया था
बे-साख़्ता क्यूँ अश्क तुम्हारे निकल आए
मंसूर उस्मानी
ग़ज़ल
मिरी बे-साख़्ता हिचकी मुझे खुल कर बताती है
तिरे अपनों को गाओं में तो अक्सर याद आता है







