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ग़ज़ल
तेरे मुहीत में कहीं गौहर-ए-ज़ि़ंदगी नहीं
ढूँड चुका मैं मौज मौज देख चुका सदफ़ सदफ़
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
जो मौज-ए-दरिया लगी ये कहने सफ़र से क़ाएम है शान मेरी
गुहर ये बोला सदफ़-नशीनी है मुझ को सामान आबरू का
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
फ़ुनून-ए-लतीफ़ा
जिस से दिल-ए-दरिया मुतलातिम नहीं होता
ऐ क़तरा-ए-नैसाँ वो सदफ़ क्या वो गुहर कया!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
असरार-ए-पैदा
मौजों की तपिश क्या है फ़क़त ज़ौक़-ए-तलब है
पिंहाँ जो सदफ़ में है वो दौलत है ख़ुदा-दाद













