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ग़ज़ल
अगर आँखें सलामत हैं तो क्या क्या कुछ दिखाएगा
यही फैला हुआ जल्वा समा से ता-समक तेरा
शाद अज़ीमाबादी
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विषय
समाज
समाज शायरी
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ग़ज़ल
न होवे 'आबरू' ख़ाना-ख़राबी क्यूँ कि मर्दुम की
क्या अंझुवाँ में मेरे अब समा सीं ता-समक दरिया
आबरू शाह मुबारक
कुल्लियात
ग़र्क़ आब-ए-अश्क से हूँ लेक उड़ा जाता हूँ
जूँ समक गो कि मिरे डूबे हैं पर पानी में
मीर तक़ी मीर
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
उम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैं
और महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ताज-महल
लेकिन उन के लिए तश्हीर का सामान नहीं
क्यूँकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़्लिस थे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
आवारा
बढ़ के उस इन्दर सभा का साज़ ओ सामाँ फूँक दूँ
उस का गुलशन फूँक दूँ उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ










