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ग़ज़ल
यही मिलने का समय भी है बिछड़ने का भी
मुझ को लगता है बहुत अपने से डर शाम के बाद
कृष्ण बिहारी नूर
ग़ज़ल
दिल जवाँ सपने जवाँ मौसम जवाँ शब भी जवाँ
तुझ को मुझ से इस समय सूने में मिलना चाहिए
गोपालदास नीरज
ग़ज़ल
ग़ैब-समय के ज्ञान में पागल कितनी तान लगाएगा
जितने सुर हैं साज़ से बाहर उस से ज़ियादा साज़ में चुप
उबैदुल्लाह अलीम
नज़्म
हिण्डोला
किसी समय में धनुष-बान को सँभाला था
इसी दयार ने देखी है 'कृष्ण' की लीला











