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जगदीश सहाय सक्सेना

शाहजहाँपुर, भारत

जगदीश सहाय सक्सेना

ग़ज़ल 4

 

शेर 5

है ये तक़दीर की ख़ूबी कि निगाह-ए-मुश्ताक़

पर्दा बन जाए अगर पर्दा-नशीं तक पहुँचे

हुई थी इक ख़ता सरज़द सो उस को मुद्दतें गुज़रीं

मगर अब तक मिरे दिल से पशेमानी नहीं जाती

उल्फ़त की थीं दलील तिरी बद-गुमानियाँ

अब बद-गुमान मैं हूँ कि तू बद-गुमाँ नहीं

हुजूम-ए-रंज-ओ-ग़म ने इस क़दर मुझ को रुलाया है

कि अब राहत की सूरत मुझ से पहचानी नहीं जाती

रंज अलम का लुत्फ़ उठाने के वास्ते

राहत से भी निबाह किए जा रहा हूँ मैं

पुस्तकें 1

आब-ओ-रंग

 

1974

 

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