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अख़तर शाहजहाँपुरी

1940 | शाहजहाँपुर, भारत

ग़ज़ल 16

शेर 20

अभी तहज़ीब का नौहा लिखना

अभी कुछ लोग उर्दू बोलते हैं

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वो जुगनू हो सितारा हो कि आँसू

अँधेरे में सभी महताब से हैं

कोई मंज़र नहीं बरसात के मौसम में भी

उस की ज़ुल्फ़ों से फिसलती हुई धूपों जैसा

तुम्हारे ख़त कभी पढ़ना कभी तरतीब से रखना

अजब मशग़ूलियत रहती है बेकारी के मौसम में

पुराने वक़्तों के कुछ लोग अब भी कहते हैं

बड़ा वही है जो दुश्मन को भी मुआ'फ़ करे

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