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नसीम शाहजहाँपुरी

1937 | शाहजहाँपुर, भारत

ग़ज़ल 10

शेर 5

तन्हाई के लम्हात का एहसास हुआ है

जब तारों भरी रात का एहसास हुआ है

वो ज़ुल्म भी अब ज़ुल्म की हद तक नहीं करते

आख़िर उन्हें किस बात का एहसास हुआ है

सर-ए-महशर अगर पुर्सिश हुई मुझ से तो कह दूँगा

सरापा जुर्म हूँ अश्क-ए-नदामत ले के आया हूँ

ऑडियो 8

इस लिए जफ़ाओं पर मुझ को मुस्कुराना था

एक धुँदला सा सितारा भी बहुत होता है

किसी के इश्क़ में ये हाल-ए-ज़ार रहता है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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