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रविश सिद्दीक़ी

1909 - 1971 | शाहजहाँपुर, भारत

अर्ध-क्लासिकी अंदाज़ के प्रमुख लोकप्रिय शायर

अर्ध-क्लासिकी अंदाज़ के प्रमुख लोकप्रिय शायर

रविश सिद्दीक़ी

ग़ज़ल 41

नज़्म 3

 

अशआर 18

हज़ार रुख़ तिरे मिलने के हैं मिलने में

किसे फ़िराक़ कहूँ और किसे विसाल कहूँ

उर्दू जिसे कहते हैं तहज़ीब का चश्मा है

वो शख़्स मोहज़्ज़ब है जिस को ये ज़बाँ आई

वो शख़्स अपनी जगह है मुरक़्क़ा-ए-तहज़ीब

ये और बात है कि क़ातिल उसी का नाम भी है

तल्ख़ी-ए-ज़िंदगी अरे तौबा

ज़हर में ज़हर का मज़ा मिला

दिल गवारा नहीं करता है शिकस्त-ए-उम्मीद

हर तग़ाफ़ुल पे नवाज़िश का गुमाँ होता है

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पुस्तकें 9

 

ऑडियो 4

क्या सितम कर गई ऐ दोस्त तिरी चश्म-ए-करम

तुझ पे खुल जाए कि क्या मेहर को शबनम से मिला

नक़ाब-ए-शब में छुप कर किस की याद आई समझते हैं

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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