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ग़ज़ल
कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी
परवीन शाकिर
नज़्म
रक़ीब से!
ज़ेर-दस्तों के मसाइब को समझना सीखा
सर्द आहों के रुख़-ए-ज़र्द के मअ'नी सीखे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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गीत
ख़ुशियों की मंज़िल ढूँडी तो ग़म की गर्द मिली
चाहत के नग़्मे चाहे तो आह-ए-सर्द मिली
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
मैं सारा दिन बहुत मसरूफ़ रहता हूँ मगर जूँही
क़दम चौखट पे रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
वसी शाह
नज़्म
मता-ए-ग़ैर
ढूँडती रहती हैं तख़्ईल की बाँहें तुझ को
सर्द रातों की सुलगती हुई तन्हाई में
साहिर लुधियानवी
नज़्म
इबलीस की मजलिस-ए-शूरा
मैं ने मुनइ'म को दिया सरमाया दारी का जुनूँ
कौन कर सकता है इस की आतिश-ए-सोज़ाँ को सर्द
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हसन कूज़ा-गर (1)
जहाँ-ज़ाद नीचे गली में तिरे दर के आगे
ये मैं सोख़्ता-सर हसन-कूज़ा-गर हूँ!
नून मीम राशिद
नज़्म
हिरास
रात की सर्द ख़मोशी में हर इक झोंके से
तेरे अन्फ़ास तिरे जिस्म की आँच आती है














