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नज़्म
ला-इंतिहा अभी
फ़न्न-ए-तख़्लीक़ हिचकियाँ ले रहा है पैहम
यहाँ तो अब सौमों में और मस्जिदों में
करामत अली करामत
नज़्म
कभी कभी
तिरी नज़र की शुआ'ओं में खो भी सकती थी
अजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम हो कर
साहिर लुधियानवी
नज़्म
हम जो तारीक राहों में मारे गए
तेरे हातों की शम्ओं की हसरत में हम
नीम-तारीक राहों में मारे गए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
एक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं
एक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं
जावेद अख़्तर
नज़्म
हार्ट-अटैक
और जब याद की बुझती हुई शम्ओं में नज़र आया कहीं
एक पल आख़िरी लम्हा तिरी दिलदारी का









