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ग़ज़ल
दिला ये दर्द-ओ-अलम भी तो मुग़्तनिम है कि आख़िर
न गिर्या-ए-सहरी है न आह-ए-नीम-शबी है
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
परछाइयाँ
ये जल्वे पैकर-ए-शब-ताब के ये बज़्म-ए-शोहूद
ये मस्तियाँ कि मय-ए-साफ़-ओ-दुर्द सब बे-बूद
फ़िराक़ गोरखपुरी
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नज़्म
आधी रात
फ़ज़ा-ए-नीम नर्गिस-ए-ख़ुमारआलूद
कँवल की चुटकियों में बंद है नदी का सुहाग
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
कोई संग-ए-रह भी चमक उठा तो सितारा-ए-सहरी कहा
मिरी रात भी तिरे नाम थी उसे किस ने तीरा-शबी कहा
अदा जाफ़री
ग़ज़ल
गिर्या-ए-नीम-शबी की ने'मत जब से बहाल हुई
हर लहज़ा उम्मीद-ए-हुज़ूरी बढ़ती जाती है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
अब खोलिए किताब-ए-नसीहत को शैख़ फिर
शब मय-कदे में आप ने जो कुछ किया किया











