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ग़ज़ल
शकील बदायूनी
नज़्म
दर्द आएगा दबे पाँव
शोला-ए-दर्द जो पहलू में लपक उट्ठेगा
दिल की दीवार पे हर नक़्श दमक उट्ठेगा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
मेरा अज़्म इतना बुलंद है कि पराए शोलों का डर नहीं
मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है ये कहीं चमन को जला न दे
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
अभी ख़ामोश हैं शो'लों का अंदाज़ा नहीं होता
मिरी बस्ती में हंगामों का अंदाज़ा नहीं होता
मुज़फ़्फ़र रज़्मी
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उद्धरण
सआदत हसन मंटो
ग़ज़ल
नज़र लिपटी है शोलों में लहू तपता है आँखों में
उठा ही चाहता है कोई तूफ़ाँ हम न कहते थे
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
मिलेंगे मुफ़्त शोलों की क़बाएँ बाँटने वाले
मगर रहने को काग़ज़ का मकाँ कोई नहीं देगा
ज़फ़र गोरखपुरी
ग़ज़ल
मिरे नाम के हर्फ़ चमकते हैं लेकिन ये चमक है शो'लों की
मैं एक ऐसी सच्चाई हूँ जिसे लोग क़ुबूल नहीं करते
असअ'द बदायुनी
ग़ज़ल
तेज़ हवा का इक झोंका शो'लों में बदल के रख देगा
चिंगारी को दबाए रखना तुम ही कहो क्या मुमकिन है
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
ग़ज़ल
कभी हमारी ज़रूरत पड़ेगी दुनिया को
दिलों की बर्फ़ को शो'लों में ढालने के लिए
एहसान दानिश कांधलवी
नज़्म
पदमनी
नर्म ओ नाज़ुक तुझे आज़ा दिए जलने के लिए
दिल दिया आग के शोलों पे पिघलने के लिए
सुरूर जहानाबादी
ग़ज़ल
सौ बार बसाई है शब-ए-वस्ल की जन्नत
सौ बार ग़म-ए-हिज्र के शो'लों में जले हैं







