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नज़्म
शिकवा
टल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थे
पाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थे
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
शकील बदायूनी
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नज़्म
कभी कभी
तिरी नज़र की शुआ'ओं में खो भी सकती थी
अजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम हो कर
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
तुझे चाँद बन के मिला था जो तिरे साहिलों पे खिला था जो
वो था एक दरिया विसाल का सो उतर गया उसे भूल जा
अमजद इस्लाम अमजद
नज़्म
ताज-महल
मुर्दा-शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक मकानों को तो देखा होता
साहिर लुधियानवी
नज़्म
हम जो तारीक राहों में मारे गए
तेरे हातों की शम्ओं की हसरत में हम
नीम-तारीक राहों में मारे गए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
वो इक अंदोह था तारीख़ का अंदोह-ए-सोज़िंदा
वो नामों का दरख़्त-ए-ज़र्द था और उस की शाख़ों को
जौन एलिया
नज़्म
इस वक़्त तो यूँ लगता है
शाख़ों में ख़यालों के घने पेड़ की शायद
अब आ के करेगा न कोई ख़्वाब बसेरा





