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ग़ज़ल
इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है
जिगर मुरादाबादी
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ग़ज़ल
अपने अपने दिल के अंदर सिमटे हुए हैं हम दोनों
गुम-सुम गुम-सुम मैं भी बहुत हूँ खोया खोया तू भी है
फ़राग़ रोहवी
नज़्म
हाथों का तराना
बहती हुई बिजली की लहरें, सिमटे हुए गंगा के धारे
धरती के मुक़द्दर के मालिक, मेहनत के उफ़ुक़ के सय्यारे
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
आरिज़ पे सिमटे ख़ुद-ब-ख़ुद ज़ुल्फ़ों के घूँगर वाले बाल
है नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़
अहमद हुसैन माइल
नज़्म
बड़े नाज़ से आज उभरा है सूरज
हज़ारों बरस के ये सिमटे से पौदे
ये हैं आज भी सर्द बेहाल बे-दम


