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नज़्म
यार लोग
फ़र्त-ए-अदब से सिमटें सिकुड़ें झुक जाएँ
और कुचले मसअले रौंदे लहजे में पूछें
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे
जौन एलिया
ग़ज़ल
इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है
जिगर मुरादाबादी
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शेर
यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे
जौन एलिया
ग़ज़ल
सिराज औरंगाबादी
नज़्म
ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में
मैं सब तिरी नज़्र कर रहा हूँ
ये उन ज़मानों की साअ'तें हैं
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
अंधेरा ज़ेहन का सम्त-ए-सफ़र जब खोने लगता है
किसी का ध्यान आता है उजाला होने लगता है






