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ग़ज़ल
सोऊँ क्या आँखों की ढेले हो गई हैं संग-ए-राह
आ के तेरे ख़्वाब-गह में ठोकरें खाती है नींद
इमदाद अली बहर
नज़्म
भाई-चारा
मैं सोऊँ तो मेरे सपनों में परियाँ आ जाएँ
मैं जागूँ तो मुझ को अम्मी अपने गले लगाएँ
शौकत परदेसी
नज़्म
वक़्त की डिबिया
कैसे सोऊँ मैं निशाँ तक भी न हो जब रात का
मेरी अम्माँ अब तो रातें सारी ग़ाएब हो गईं



