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विषय
सोच
सोच शायरी
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ग़ज़ल
कुछ तो मैं ही पागल था और कुछ था उस का पागल-पन
सोचो मैं ने झेला होगा कितना कितना पागल पन
प्रशांत शर्मा दराज़
ग़ज़ल
बे-धड़क 'जोश' वो बढ़ते रहे मंज़िल की तरफ़
क़ाफ़िले वालों ने सोची नहीं अंजाम की बात

