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ग़ज़ल
हुसूल-ए-अम्न-ओ-मुहब्बत की चाशनी के लिए
मिज़ाज-ए-तल्ख़ी-ए-दौराँ 'सुख़न' गवारा कर
अब्दुल वहाब सुख़न
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कुल्लियात
हर बैत में क्या 'मीर' तिरी बातें गुथी हैं
कुछ और सुख़न कर कि ग़ज़ल सिल्क-ए-गुहर है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
ग़ज़ल सुनाई जो सर्वत को मैं ने ऐ 'हाशिम'
वो बोले सुन के सुख़न-कार इक समुंदर है
हाशिम रज़ा जलालपुरी
ग़ज़ल
इक़बाल अज़ीम
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
शुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू ने
हम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू ने
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
'तनवीर' और मश्क़-ए-सुख़न कर न हार मान
अहल-ए-सुख़न में अब भी अगर नामवर न हो
सय्यद तनवीर रज़ा आबिदी
कुल्लियात
तरफ़ें रखे है एक सुख़न चार चार 'मीर'
क्या क्या कहा करें हैं ज़बान-ए-क़लम से हम
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
जो क़र्ज़ की मय पी कर तस्ख़ीर-ए-सुख़न कर ले
ईमाँ उसी दिल्ली के मय-नोश पे रखता हूँ
