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ग़ज़ल
चलो अच्छा ही हुआ मुफ़्त लुटा दी ये जिंस
हम को मिलता सिला-ए-हुस्न-ए-नज़र ही कितना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
यहाँ शुऊ'र के नाख़ुन तो हम भी रखते हैं
मगर ये उक़्दा-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र कहाँ खोलें
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
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ग़ज़ल
अजब शय है 'फ़ज़ा' ज़ेहन ओ नज़र की ये असीरी भी
मुसलसल देखते रहना बराबर सोचते रहना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
उजाले की लकीर
रास्ते पर कई ख़ुर्शीद नए जल उट्ठे
रौशनी देखिए ता-हद्द-ए-नज़र फैल गई
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
शहीद-ए-मिल्लत-ओ-वतन!
ग़ुबार-ए-रह तिरा है हर जवाँ को सुरमा-ए-नज़र
तिरे चराग़ से सहर की मिल गई हमें ख़बर
एस. ए. रहमान
ग़ज़ल
कैसे आशोब-ए-दानिश पे रखता नज़र मैं कम-आगाह था
दे गया मुझ को आँखों के बदले कोई बे-बसर आइने



