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ग़ज़ल
तम मेरे ख़यालों में खो कर बर्बाद न करना जीवन को
जब कोई सहेली बात तुम्हें समझाए कभी तो मत रोना
हसरत जयपुरी
नज़्म
मैं ने भी आम रख दिया
तुम ने ख़ुदा के घर में भी फ़ित्ना-ए-आम रख दिया
मेरे इमाम की जगह अपना इमाम रख दिया
खालिद इरफ़ान
शेर
हिज्र-ए-जानाँ के अलम में हम फ़रिश्ते बन गए
ध्यान मुद्दत से छुटा आब-ओ-तआ'म-ओ-ख़्वाब का
मुनीर शिकोहाबादी
नज़्म
दर-मद्ह-आम
मैं तुम को लेने वक़्त पे पहुँचूँगा और तुम
मिलना सड़क पे जो कि तुम्हारा मक़ाम है
ख़ालिद महमूद
ग़ज़ल
सोने में नज़्ज़ारा कर लूँ रू-ए-आलम-ताब का
ख़ौफ़ क्या दुज़्द-ए-निगह को है शब-ए-महताब का












