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ग़ज़ल
करते हैं जिस पे ता'न कोई जुर्म तो नहीं
शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ उल्फ़त-ए-नाकाम ही तो है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
शिकवा
नाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँ
हम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
ता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्या
आ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्या
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
हुआ जब ग़म से यूँ बे-हिस तो ग़म क्या सर के कटने का
न होता गर जुदा तन से तो ज़ानू पर धरा होता
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
न तन में ख़ून फ़राहम न अश्क आँखों में
नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वुज़ू ही सही
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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रेख़्ता शब्दकोश
tan
तन تَن
जीव का स्थूल ढाँचा। देह। शरीर। मुहा०-तन कसना तपस्या के द्वारा अपने आपको सहनशील बनाना। तन तोड़ना = (क) अंगड़ाई लेना। (ख) बहुत अधिक परिश्रम कराना। तन देना = ध्यान देना। तन मन मारना = इंद्रियों को वश में रखना। (किसी के तन लगना = (क) किसी के उपयोग में आना। (ख) किसी के प्रति परिणाम होना या प्रभाव पड़ना। जैसे जिसके तन लगती है वही जानता है।
Taa.n-Taa.n
टाँ-टाँ ٹاں ٹاں
رک : ٹائیں ٹائیں .
Tuu.n-Taa.n
टूँ-टाँ ٹُوں ٹاں
ٹوٹا پھوٹا تکلم یا بڑبڑاہٹ.
jaa.n-taa.n
जाँ-ताँ جاں تاں
رک: جہاں تہاں ، ہر جگہ.
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ग़ज़ल
तबीअ'त अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तिरी यादों की चादर तान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
वो शायद माइदे की गंद बिरयानी न खाती हो
वो नान-ए-बे-ख़मीर-ए-मैदा कम-तर ही चबाती हो
जौन एलिया
ग़ज़ल
न गँवाओ नावक-ए-नीम-कश दिल-ए-रेज़ा-रेज़ा गँवा दिया
जो बचे हैं संग समेट लो तन-ए-दाग़-दाग़ लुटा दिया
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
जहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनी
जिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दो इश्क़
ख़ैरिय्यत-ए-जाँ राहत-ए-तन सेह्हत-ए-दामाँ
सब भूल गईं मस्लिहतें अहल-ए-हवस की
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
रूह क्या होती है इस से उन्हें मतलब ही नहीं
वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं
साहिर लुधियानवी
शेर
तबीअत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तिरी यादों की चादर तान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
परछाइयाँ
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मैं फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जोड़े में











